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Sach Ke Samipya



MRP :  ₹ 250 ( Paper Back )

  • Author Name      :   Yogesh Yadav
  • ISBN          :   978-93-90468-25-6
  • No of Pages      :   168
  • Publisher             :   Sankalp Publication
  • SKU Code       :  SP/20/00179
  • Availablity      :   AVAILABLE
  • Book Size       :   6X9
  • Publishing Date  :   2020-12-18



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Techip Infotech Pvt Ltd

योगेश यादव जी संक्षिप्त में बयां नहीं किए जा सकते, आप उनके के लिए शब्दों की सीमा भी तय नहीं करते। वे गहरे साहित्यकार होने के साथ ही बहुत गहरे मंचीय कलाकार भी हैं, उनका चेहरा संवाद है, वाणी ओज और विनम्रता का एक अनूठा संगम है। वे राजनीतिक और सामाजिक जीवन से भी जुडे हुए हैं, हम यहां उनके साहित्यिक भाव को महसूस कर रहे हैं इसीलिए केवल उसी की बात की जानी चाहिए। उनकी कहानियां बरामदे की दरकन का मर्म है और उसमें ही उगते अंकुरण और उसकी पीठ पर सवार उम्मीद का प्रतिनिधित्व करती हैं। नवजात उम्मीद और अंकुरण कहीं न कहीं एक जैसे मर्म की महक होते हैं। उनकी कहानियां जहां समाज का चेहरा हैं तो उसकी टूटन और चटख से रिसता हुआ दर्द भी। उनकी कहानियोंं में सच पूरी शक्ति से शाब्दिक तौर पर चीखता है। भीड़ बहुत है और भीड़ में अमूमन रिश्ते दरक जाते हैं, ये ऐसा दौर है जब आंखों में तूफान है, रेतीला तूफान और आंसु उस तूफान में कहीं झुलस कर रह गए है, लेकिन योगेश यादव की कहानियां उस दरकन और उधडन में रेशों के तार-तार होने के अहसासों को भली भांति अभिव्यक्त करती हैं। वे एक समाज देखते हैं, नया, निखरा सा इस चीखते हुए दयार के बीच से। वे अपनी कहानियों में कोरी कल्पना का कोई संसार नहीं बुनते लेकिन अभिभूति और मानवीयता की दीवारों वाले घर को अवश्य महसूस करते हैं। वे महसूस करते हैं कि रिश्तों की जिम्मेदारी और समाज के सौंधेपन के बीच कहीं कोई आदमी हर दिन दरक रहा है, टूट रहा है, आंगन और आंगन के बीच की दूरी में एक नया समाज अपना आकार गढ़ रहा है, उनकी कहानियां उस समाज को चुनौती देती हैं जो विखंडन चाहता है, जो टूटन का प्रतिनिधित्व करना चाहता है, उनकी कहानियां उस सूर्योदय को भी महसूस करती हैं जो ब्रह्म मुहुर्त से भी महसूस किया जा सकता है। स्याह रात में टूटते समाज और बिखरते चेहरों पर कोई एक भरोसा है जो शब्द है, अनुभति है, कहानियों का समाज है जो कहता है कि अंधेरे के बाद एक सुबह आती है....। उनकी कहानियों को पढ़ना शब्दों के कई युगों को जीने जैसा है

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